उषा उत्थुप भारत की सबसे विशिष्ट और मशहूर पार्श्व गायिकाओं (प्लेबैक सिंगर्स) और पॉप कलाकारों में से एक हैं। अपनी गहरी और दमदार आवाज़, रंग-बिरंगी साड़ियों, बड़ी बिंदी, बालों में लगे फूलों और मंच पर अपनी ऊर्जावान उपस्थिति के लिए जानी जाने वालीं उषा उत्थुप ने पांच दशकों से भी अधिक समय तक भारतीय संगीत में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
| नाम | ऊषा अय्यर उत्थुप |
| ख्याति / पेशा | गायिका और कलाकार |
| जन्म तिथि | 7 नवंबर 1947 |
| जन्म स्थान | बॉम्बे (वर्तमान मुंबई), महाराष्ट्र, ब्रिटिश भारत |
| भाषाएं | अंग्रेजी, हिंदी, बंगाली, तमिल, मलयालम, कन्नड़ और कई अन्य भारतीय भाषाएं। |
उषा का जन्म मुंबई में एक तमिल भाषी परिवार में हुआ था। उनके पिता, वैद्यनाथ सोमेश्वर सामी, मुंबई पुलिस से जुड़े हुए थे। दिलचस्प बात यह है कि अपनी असामान्य रूप से गहरी आवाज़ के कारण, शुरुआत में उन्हें एक पारंपरिक गायिका नहीं माना जाता था। हालाँकि, यही खास आवाज़ बाद में उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई।
भारतीय सिनेमा में अपने काम के ज़रिए उषा को व्यापक पहचान मिली। उनके कुछ सबसे लोकप्रिय गाने इस प्रकार हैं:
| गाना | फिल्म |
| डार्लिंग | 7 खून माफ़ |
| हरी ओम हरी | प्यारा दुश्मन |
| रम्बा हो हो हो | अरमान |
| वन टू चा चा चा | शालीमार |
| कोई यहाँ आहा नाचे नाचे | डिस्को डांसर |
| दोस्तों से प्यार किया | शान |
उनका गाना 'डार्लिंग' (जिसमें रेखा भारद्वाज भी शामिल थीं) बेहद लोकप्रिय हुआ और इसके लिए उन्हें 2012 में सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका (बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर) का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
पुरस्कार और सम्मान
उषा उत्थुप की निजी जीवन
उषा उत्थुप की शादी रामू से हुई थी, जिनका 2024 में निधन हो गया। उनके दो बच्चे हैं - एक बेटा और एक बेटी। अपने लंबे करियर के बावजूद, वह लाइव प्रस्तुतियों से जुड़ी रहीं और आज भी युवा संगीतकारों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।
उषा उत्थुप की विरासत और योगदान
उषा उत्थुप केवल एक पार्श्व गायिका (प्लेबैक सिंगर) से कहीं बढ़कर हैं। वह एक ऐसी अग्रणी कलाकार हैं, जिन्होंने इस पारंपरिक सोच को चुनौती दी कि एक महिला गायिका की आवाज़ कैसी होनी चाहिए। ऐसे समय में जब भारतीय पार्श्व गायन में मीठी और सुरीली आवाज़ों का बोलबाला था, उन्होंने अपनी गहरी और अलग तरह की आवाज़ के साथ एक सफल करियर बनाया।
उनका जीवन इस बात का एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि कैसे अपनी अलग पहचान, आत्मविश्वास, लगन और प्रतिभा के ज़रिए रूढ़िवादी धारणाओं को पीछे छोड़ा जा सकता है।