महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन (मनकोम्बु संबाशिवन स्वामीनाथन) को भारत में 'हरित क्रांति का जनक' (Father of Green Revolution in India) कहा जाता है। एक प्रख्यात भारतीय आनुवंशिकीविद् (Geneticist) और कृषि वैज्ञानिक (Agricultural Scientist) हैं। उनका जन्म 7 अगस्त, 1925 को कुंभकोणम, तमिलनाडु, भारत में हुआ था। देश में खाद्य उत्पादन में तीव्र वृद्धि के चलते इन्हें भारत रत्न की उपाधि दी गई।
| पूरा नाम | मनकोम्बु संबाशिवन स्वामीनाथन (M.S. Swaminathan) |
| जन्म तिथि | 7 अगस्त 1925 |
| जन्म स्थान | कुंभकोणम, तमिलनाडु, भारत |
| माता | पार्वती थंगम्मल |
| पिता | डॉ. एम.के. संबाशिवन |
| पत्नी | मीना स्वामीनाथन |
| निधन | 28 सितंबर 2023 (आयु 98 वर्ष, चेन्नई) |
| प्रसिद्धि का कारण | भारत में हरित क्रांति के जनक, कृषि वैज्ञानिक |
| मुख्य सम्मान | भारत रत्न (मरणोपरांत, 2024), पद्म विभूषण, विश्व खाद्य पुरस्कार |
माता-पिता (Parents): उनके पिता का नाम डॉ. एम.के. संबाशिवन (Dr. M.K. Sambasivan) था, जो एक जाने-माने सर्जन और महात्मा गांधी के अनुयायी (स्वतंत्रता सेनानी) थे। उनकी माता का नाम पार्वती थंगम्मल (Parvati Thangammal) था। जब स्वामीनाथन केवल 11 वर्ष के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया था।
पत्नी (Wife): उनकी पत्नी का नाम मीना स्वामीनाथन (Mina Swaminathan) था। जिन्हें मुख्य रूप से 'अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन' (बचपन की शिक्षा) और 'मोबाइल क्रेच' की स्थापना में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है।
बच्चे (Children):
डॉ. सौम्या स्वामीनाथन (Dr. Soumya Swaminathan): वह एक प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) और वैज्ञानिक हैं। वह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की पूर्व उप-महानिदेशक और मुख्य वैज्ञानिक (Chief Scientist) रह चुकी हैं।
मधुरा स्वामीनाथन (Madhura Swaminathan): वह एक प्रमुख अर्थशास्त्री (Economist) हैं और भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI), बैंगलोर में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।
नित्या राव (Nithya Rao): वह यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया, यूके में जेंडर और विकास (Gender and Development) की प्रोफेसर और शोधकर्ता हैं।
हरित क्रांति (Green Revolution) : स्वामीनाथन ने आधुनिक कृषि तकनीकों के साथ-साथ गेहूं और चावल की उच्च उपज वाली किस्मों को पेश करने और बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप फसल की पैदावार में काफी वृद्धि हुई। इस आंदोलन ने भोजन की कमी को दूर करने में मदद की और खाद्य उत्पादन में भारत की आत्मनिर्भरता में योगदान दिया।
फसल सुधार (Crop Improvement) : उन्होंने नई फसल किस्मों के विकास पर बड़े पैमाने पर काम किया जो बीमारियों, कीटों और पर्यावरणीय तनावों के प्रति अधिक प्रतिरोधी थीं। उनके शोध से फसल की पैदावार और किसानों की आजीविका में सुधार करने में मदद मिली।
पादप आनुवंशिकी (Plant Genetics) : स्वामीनाथन ने पादप आनुवंशिकी और प्रजनन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके काम ने फसल आनुवंशिकी और जैव प्रौद्योगिकी में प्रगति की नींव रखी।
विश्व खाद्य पुरस्कार (World Food Price) : खाद्य उत्पादन बढ़ाने और वैश्विक खाद्य सुरक्षा में सुधार के लिए उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें 1987 में विश्व खाद्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
अंतर्राष्ट्रीय कार्य (International Works) : भारत के कृषि विकास में अपने योगदान के अलावा, स्वामीनाथन वैश्विक खाद्य सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करने के उद्देश्य से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय पहल और संगठनों में भी शामिल रहे हैं।
शैक्षणिक और संस्थागत भूमिकाएँ (Educational & Institutional Roles) : स्वामीनाथन ने विभिन्न शैक्षणिक और नेतृत्व पदों पर काम किया है, जिसमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक और प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) के अध्यक्ष के रूप में कार्य करना शामिल है।
एम. एस. स्वामीनाथन के काम का न केवल भारत में बल्कि विश्व स्तर पर कृषि पद्धतियों, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास पर गहरा प्रभाव पड़ा है। किसानों के जीवन को बेहतर बनाने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को सुनिश्चित करने के प्रति उनके समर्पण के लिए उन्हें व्यापक रूप से सम्मान दिया जाता है।
भारत रत्न (2024): भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' (9 फरवरी, 2024) से सम्मानित किया।
विश्व खाद्य पुरस्कार (World Food Prize, 1987): वह प्रथम विश्व खाद्य पुरस्कार पाने वाले व्यक्ति थे। इस पुरस्कार राशि से उन्होंने चेन्नई में 'एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन' (MSSRF) की स्थापना की।
पद्म पुरस्कार: पद्म श्री (1967), पद्म भूषण (1972), और पद्म विभूषण (1989)।
रमन मैगसेसे पुरस्कार: 1971 में सामुदायिक नेतृत्व के लिए।
28 सितंबर 2023 को 98 वर्ष की आयु में चेन्नई में उनका निधन हो गया। उनके द्वारा कृषि क्षेत्र में किए गए सुधारों और अनुसंधान ने भारत की आने वाली पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की।