ब्रिगेडियर महाराजा सवाई भवानी सिंह जयपुर के अंतिम राजपरिवार के महाराजा और भारतीय सेना के एक बेहद साहसी अधिकारी थे, जिन्होंने शाही परंपरा और आधुनिक राष्ट्रप्रेम का बेहतरीन तालमेल बिठाया। उन्हें खेल-कूद के प्रति प्रेम, युद्ध के मैदान में दिखाई गई बहादुरी और अपनी ऐतिहासिक विरासत को सहेजने के लिए हमेशा याद किया जाता है।
| नाम | ब्रिगेडियर महाराजा सवाई भवानी सिंह (Brigadier Maharaja Sawai Bhawani Singh) |
| ख्याति / उपाधि | जयपुर रियासत के अंतिम शासक महाराजा, प्रख्यात सेनाधिकारी एवं 'महावीर चक्र' विजेता |
| जन्म तिथि | 22 अक्टूबर 1931 |
| जन्म स्थान | जयपुर, राजस्थान, ब्रिटिश भारत |
| पिता | महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय (जयपुर के अंतिम शासक नरेश) |
| माता | महारानी मरुधर कंवर (जोधपुर राजघराने से) |
| पत्नी | राजकुमारी पद्मिनी देवी (सिरमौर रियासत की राजकुमारी, विवाह: 10 मार्च 1966) |
| संतान | 1 पुत्री: राजकुमारी दीया कुमारी (वर्तमान राजनेत्री एवं सांसद) |
| निधन | 17 अप्रैल 2011 (गुरुग्राम, हरियाणा) |
उनका जन्म 22 अक्टूबर 1931 को जयपुर के महाराजा मान सिंह द्वितीय और उनकी पहली पत्नी मरुधरा कंवर के यहाँ हुआ था। उनकी शुरुआती पढ़ाई भारत में हुई और बाद में उन्होंने इंग्लैंड के हैरो स्कूल से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनके परिवार का इतिहास राजपूताना की शान से जुड़ा रहा है; उनका विवाह पद्मिनी देवी से हुआ था, जो हिमाचल प्रदेश के सिरमौर राजपरिवार से ताल्लुक रखती हैं, और उनकी इकलौती संतान राजकुमारी दीया कुमारी हैं।
भवानी सिंह ने भारतीय सेना में एक कमीशंड अधिकारी के रूप में सेवा दी और 1971 के भारत-पाक युद्ध में 'पैराशूट रेजिमेंट' की 10वीं बटालियन का नेतृत्व करते हुए अभूतपूर्व वीरता का परिचय दिया। सेना में रहते हुए उन्होंने कई जोखिम भरे अभियानों को अंजाम दिया और ब्रिगेडियर के पद तक पहुँचे। इसके अलावा, अपने पिता महाराजा मान सिंह द्वितीय के निधन के बाद 1970 में वे जयपुर के औपचारिक महाराजा बने और उन्होंने राजघराने की जिम्मेदारियों के साथ-साथ पर्यटन व सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में भी काम किया।
सैन्य सेवा में उनके अदम्य साहस और देश के प्रति समर्पण के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया था। अपने जीवनकाल में उन्होंने जयपुर के महलों को संग्रहालयों में बदलकर आम जनता के लिए खोला और शहर की सांस्कृतिक धरोहर को बचाए रखने में अहम भूमिका निभाई।
अपने पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने जयपुर की राजशाही परंपरा को संभाला और अपने निधन से पहले अपनी विरासत व उत्तराधिकार अपनी बेटी दीया कुमारी और उनके पुत्रों (विशेषकर पोते लक्ष्यराज सिंह) को सौंप दिया। 17 अप्रैल 2011 को उनके निधन के साथ जयपुर के राजघराने के एक गौरवशाली अध्याय का अंत हुआ, लेकिन उनका नाम आज भी इतिहास में शान से लिया जाता है।
जयपुर रियासत
महावीर चक्र
10 पैराशूट रेजिमेंट (कमांडो)